Kaam Vaasna

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चुदाई की चुल्ल

चुदाई की चुल्ल

मेरे कोचिंग में 3 लड़कों का ग्रुप था, जो थोड़े हरामी टाइप के थे, लड़कियों का पीछा करना, उनको छेड़ना, ये सब उनके शगल थे। उन्होंने एक-दो बार सीमा का भी पीछा किया था और उसके बारे में अश्लील बातें करते थे। सीमा इन लड़कों से काफी दु:खी थी, क्यूंकि उसे पता था कि ये लड़के उसका पीछा करते हैं।

मैं, मेरा चचेरा भाई और दीदी-1

मैं, मेरा चचेरा भाई और दीदी-1

सुहाना भी अब बड़ी होने लगी थी, उसके शरीर की गोलाइयाँ साफ़ साफ़ दिखाई देती थी। उसका चेहरा कोई हीरोइन की तरह तो नहीं था, पर उसकी अदाएँ बहुत ही निराली थी। उसके होंठ, गाल और नटखट आँखों तो इतनी मस्त थी कि क्या बताऊँ। उन्हें देखकर तो कोई भी अपने अंदर की वासना को जगने से रोक नहीं सकता।

मैं, मेरा चचेरा भाई और दीदी-2

मैं, मेरा चचेरा भाई और दीदी-2

सोनू- हाँ यार, यह बात तो सही है। पर डर लग रहा है यार ऐसा करने में।

लड़ाई का बदला मौज़ भरी चुदाई

लड़ाई का बदला मौज़ भरी चुदाई

एक दिन शाम के समय बीना के घर के सामने वाले मैदान में एक पेड़ के पास चार लड़के पेशाब कर रहे थे और लम्बे लम्बे लंड निकाल कर पेशाब झटक रहे थे। उस समय स्वीटी अपने मकान के वरांडे में थी। पहले तो उसे बड़े बड़े लंड देख कर मजा आया, वह लड़कों के लंड गौर से देखती रही। लेकिन जब लड़के जाने की तैयारी करने लगे तो अचानक स्वीटी ने अपनी मम्मी को चिल्ला कर बुलाया जो उस समय घर में ही थी।

वो चार और हम तीन

वो चार और हम तीन

उसने मेरे अकाउंट में पैसे डाल दिए और मैं मुम्बई के लिए निकल पड़ा। मैं जब मुम्बई पहुँचा तो मुम्बई में एक होटल में रुका और मीनाक्षी का इंतजार करने लगा। मीनाक्षी अपनी एक सहेली के साथ आई उसका नाम सुल्ताना था। वे दोनों बुरके में आई थीं। बुरके के ऊपर से औरत को क्या देख सकते हैं, सिर्फ आँखों के और मैंने ऊपर से ही उसके फिगर का अंदाजा लगाया। शायद बहुत खूबसूरत होगी।

मैं पूरे परिवार से चुदी-2

मैं पूरे परिवार से चुदी-2

संजय और आगे सरका और मैंने अपने पैर की उंगलियों से महसूस किया कि शॉर्ट्स के अन्दर उसका लंड खड़ा हो चुका था, मैंने घड़ी देखी और अभी दवाई देने के बाद आधा घंटा होने में 15 मिनट बाकी थे।

मैं पूरे परिवार से चुदी-1

मैं पूरे परिवार से चुदी-1

तभी एक दिन, जो मेरा पड़ोस का घर खाली पड़ा था, उसमें एक शर्मा जी अपने परिवार के साथ रहने आए। उनके 2 लड़के थे, बड़ा लड़का साइंस कॉलेज में सेकेण्ड-ईयर में था और छोटा वाला बारहवीं कक्षा में पढ़ता था।

लण्ड की मलाई की चटोरी मौसी-2

लण्ड की मलाई की चटोरी मौसी-2

मौसी- तुम बहुत ही बदमाश हो।

लण्ड की मलाई की चटोरी मौसी-1

लण्ड की मलाई की चटोरी मौसी-1

यह मेरी वास्तविक कहानी है तथा मैं अब अपनी कहानी पर आता हूँ।

मैं, मेरा चचेरा भाई और दीदी-3

मैं, मेरा चचेरा भाई और दीदी-3

सुहाना उठी और अपने कमरे में जाकर दरवाजा बंद कर दिया। सोनू मेरी तरफ़ देख रहा था और उसने फ़िर एक हल्की सी मुस्कान दी। फ़िर हम भी अपने कमरे में जाकर सो गए।

शिप्रा की चुदास-1

शिप्रा की चुदास-1

मैंने उधर पलटकर देखा वो ही आँखें वो ही सीना वो ही मुस्करता चेहरा। अब आप सोच रहे होंगे यह कौन है और कहाँ से आई। तो ये है वो आज की इस स्टोरी की हिरोइन। जी हाँ ‘शिप्रा’!

रूपा के संग प्यास बुझाई

रूपा के संग प्यास बुझाई

मैंने कहा- आइए भाभी, आपको घर छोड़ दूँ।

मैं पूरे परिवार से चुदी-3

मैं पूरे परिवार से चुदी-3

प्रेषिका : आशा
संजय यह देख कर पूरी तरह उत्तेजित हो चुका था, इससे पहले मैं कुछ कहती वो मेरे बदन पर चढ़ गया और मेरे मम्मे दबाने लगा। मैंने उसका सर पकड़ और अपनी एक चूची उसके मुँह में चूसने के लिए दे दी।
मैंने बोला- शाबाश संजय, तू जल्दी सीख गया, बोल चोदेगा अब मुझे?
संजय ने मुझे बेतहाशा चूमना शुरू कर दिया और बोला- हाँ आंटी, कहाँ डालना है लंड बताओ?
मैंने बोला- अपनी चूत की पंखुड़ियों को फैला के, जहाँ उंगली डाली दी थी, बस वहीं पर डालना है.. धीरे-धीरे घुसाना !
संजय मेरी टाँगों के बीच में बैठ गया और मैंने उसका लंड धीरे से अपने चूत में डाल लिया, उसके मुँह से आह निकल पड़ी।
वो बोला- आह.. आंटी यह तो बहुत ही मज़ा देती है।
मैं मुस्कुरा दी और बोली- देख तू दो बार पानी छोड़ चुका है, अब तू जल्दी नहीं झडेगा, मैं अपनी टाँग उठाती हूँ और तू कोशिश कर कि तेरा लंड ऊपर की तरफ मेरी बच्चेदानी के छेद पर रगड़ खाए, ऊपर की तरफ धक्के लगाएगा तो औरतों को ज्यादा मज़ा आएगा, समझा !
वो बोला- समझ गया आंटी।
और उसने फिर तो जोर-जोर के धक्के लगा कर मुझे चोदा।
मैंने बोला- संजय तुझे एक बात और सिखाती हूँ, लंड पेलते समय अगर तू औरत की चूत का दाना मसलेगा तो उसका पानी जल्दी निकलेगा और औरत को और मज़ा आएगा लेकिन औरत उत्तेजना सहन नहीं कर पाती और वो तुझे रोकेगी क्योंकि नसों में खिंचाव होता है, पर तुझे रुकना नहीं है।
वो समझ गया और उसने लंड पेलते हुए मेरी चूत का दाना भी मसलना शुरू कर दिया, मेरी चूत रस छोड़ रही थी उसके लंड के ऊपर।
मुझे उसके लंड की नसें सिकुड़ती और फैलती हुई महसूस हुई चूत में, तो मैंने तुरंत उसका लंड बाहर निकाल लिया क्योंकि मैं उसकी मलाई को चूत में नहीं झड़ने देना चाहती थी।
उसने मेरे मम्मों पर पूरे मलाई छोड़ दी और निढाल हो कर बिस्तर पर गिर पड़ा। मैं समझ गई कि उसमें अब और ताकत नहीं बची है, मैंने उसको दवाई सिर्फ 50 मिलीग्राम की दी थी, 100 मिलीग्राम की देती तो शायद दो बार तो मेरी और लेता। मैंने सोचा, चलो कुछ तो शांती मिली मेरी चूत को।
संजय निढाल हो कर थोड़ी देर लेटा रहा और कल फिर आने का वादा कर के अपने घर वापस चला गया।
मैंने चुदवा तो लिया था पर जैसे मुझे पूरी संतुष्टि नहीं हुई थी, मैं सोचने लगी, अगर संपत या शर्मा जी चुदवाने को मिल जाएँ तो मज़ा आ जाएगा।
मैंने सोचा, अगर मैं बीमार होने का नाटक करूँ तो रेणुका को बोल कर रात को संपत या शर्मा जी को अपने घर में सोने के लिए बोल सकती हूँ और शायद रात को कोई मौका मिल जाए।
बस फिर क्या था, संजय के जाने के एक घंटे बाद ही मैंने ऐसा ड्रामा करना शुरू किया, जैसे कि मुझे हाई ब्लड-प्रेशर हो गया हो और मैंने सांस तेज़ चलने का और घबराहट होने का नाटक किया और फ़ोन कर के रेणुका को बताया कि मेरी तबियत खराब हो गई है।
रेणुका ने शर्मा जी और संपत को बुलाया और बोला कि मुझे तुरंत ही हस्पताल ले जाएँ। मैं घबरा गई, मुझे हस्पताल तो जाना नहीं था, ड्रामा करने का कारण संपत को रात में अपने घर में सुलाना था।
लेकिन रेणुका मानी नहीं और बोली- मेरी तबियत ज्यादा खराब लग रही है और तुरंत हस्पताल ले कर जाना पड़ेगा।
मैंने अभी भी वही शॉर्ट् नाइटी पहनी थी जिसमे मैंने घंटे भर पहले संजय से चुदवाया था। संजय अपने कमरे में सो रहा था इसलिए उसको मेरे इस ड्रामे के बारे में कुछ भी नहीं पता था। अब सवाल यह उठा कि हस्पताल लेकर कैसे जाया जाए? शर्मा जी के पास कार तो थी नहीं, बस एक बजाज का स्कूटर ही था।
रेणुका ने बोला- मुझे बीच में बिठा कर संपत पीछे से पकड़ लेगा और शर्मा जी थोड़ा संभाल कर चला लेंगे।
एम्बुलेंस का इंतज़ार करने से रेणुका डर रही थी कि मेरी तबियत और खराब ना हो जाए। मैंने भी ज्यादा मना करना ठीक नहीं समझा क्योंकि उनको शक हो जाता कि मैं ड्रामा कर रही हूँ।
रेणुका ने एक चादर लपेट दी और मुझे संभाल कर सहारा देते हुए बाहर तक ले आईं। बजाज का स्कूटर तो दो सीटर ही होता है और मुझे अपने पैर फैला कर बीच में बैठना पड़ा।
संपत मेरे पीछे बैठा था और जब मैं बैठी तो मेरे और संपत के बीच में चादर ऊपर हो गई। चड्डी तो मैंने अपने शॉर्ट् नाइटी के नीचे वैसे ही नहीं पहनी थी और मेरी गांड सीधे संपत के लंड को दबाने लगी।
मैंने शर्मा जी के कंधों को पकड़ा हुआ था और संपत ने पीछे से मेरी कमर को। शर्मा जी ने स्कूटर स्टार्ट किया और धीरे-धीरे चलाने लगे। सड़क खराब थी और मेरी गांड के दबाव से मुझे जल्दी ही कुछ चुभता हुआ महसूस होने लगा अपनी गांड में। मुझे समझते देर ना लगी कि संपत का लंड पैंट में खड़ा हो गया था। स्कूटर रोड पर धीरे-धीरे बढ़ रहा था और मैंने अपना हाथ संपत के हाथ के ऊपर रखा और उसको ऊपर मेरी छाती के पास पकड़ने को बोला।
मेरी छाती पकड़ने के बहाने और सड़क पर गड्डे होने के कारण संपत ने मेरे मम्मे मसलने शुरू कर दिए थे। मैंने भी उसके हाथों पर अपने हाथ रख कर उसे ग्रीन सिगनल दे दिया था। अब तो मुझे ऐसा लग रहा था कि बस किसी तरह यह अपना लंड पैंट से बाहर निकाल के डाल दे। मेरी किस्मत साथ दे रही थी।
संपत ने बोला- पापा एक मिनट स्कूटर रोकना, वो आंटी को जो चादर लपेटी थी, वो खुल रही है।
शर्मा जी ने दो मिनट के लिए स्कूटर रोका, संपत ने चादर मेरे अगल-बगल तो लपेट दी पर ऐसे लपेटी कि पीछे से मेरी गांड पूरी खुली और नंगी थी।
मैंने देखा उसने अपनी पैंट की जिप को खोल दिया था। उसने मेरे चूतड़ को उठा कर अपने लिए जगह बनाई और धीरे से मुझे अपने खड़े लंड पर बिठा लिया।
उसका लंड बाहर निकला हुआ था और मेरी गांड की दरार में चुभा, मैं समझ गई संपत मेरी स्कूटर पर बैठे-बैठे ही ले लेगा।
मैं भी तो कहीं भी चुदने को तैयार थी। शर्मा जी ने स्कूटर चलाना शुरू किया और संपत ने बिना देर किए एक झटके में मेरी गांड में लंड अन्दर डाल दिया।
मैंने अपने सिसकारी को रोका और शर्मा जी का कन्धा जोर से दबा दिया।
शर्मा जी बोले- क्या हुआ? आप ठीक तो है ना बहन जी?
मैंने बोला- हाँ.. भाई साहब, मैं ठीक हूँ आप स्कूटर चलाते रहिए।
शर्मा जी स्कूटर चला रहे थे और स्कूटर खराब सड़क पर धक्के खा रहा था और संपत पीछे से मेरी गाण्ड मार रहा था। मुझे बड़ा मज़ा आ रहा था स्कूटर पर बैठ के चुदवाने में। संपत के हाथ मेरे मम्मे दबा रहे थे और उसका लंड स्कूटर के धक्को के साथ मेरी गांड में अन्दर-बाहर हो रहा था।
मैंने सोचा अगर शर्मा जी को भी मैं चोदने के लिए तैयार कर लूँ तो मज़ा आ जाएगा, मैंने सोचा कोशिश करने में कोई बुराई नहीं है। फिर क्या था, मैंने अपना हाथ शर्मा जी के कंधे से हटा के उनके कमर पर रख दिया और फिर जैसे स्कूटर धक्के खाने लगा, मेरा हाथ सामने की तरफ उनके लंड के ऊपर चला गया।
शर्मा जी कुछ नहीं बोले और स्कूटर चलाते रहे। फिर क्या था एक थोड़ा सा बड़ा गड्ढा आया तो मैंने बस शर्मा जी का लंड पकड़ कर पैंट के ऊपर से ही दबा दिया। शर्मा जी को मजा आ गया, उन्होंने मुझसे कहा- आप मुझे जरा ठीक से पकड़ लो न !
अबकी बार उन्होंने मुझे बहन जी नहीं कहा था। संपत का लंड तो मेरी गांड में था ही, फिर मैंने शर्मा जी की पैंट की ज़िप खोल कर अपना हाथ अन्दर डाल कर उनके लंड को मसलना शुरू कर दिया।
मैं धीरे से शर्मा जी के कान में फ़ुसफुसाई- मज़ा आ रहा है क्या शर्मा जी? आज रात को मेरे घर में रुकने का बहाना बना लो।
हस्पताल आने वाला था और संपत ने मेरी गांड में अपने लंड की पिचकारी छोड़ दी थी, शर्मा जी का लंड मैंने पैंट में ही झड़ा दिया।
दोनों ने मुझे डाक्टर को दिखाया, डाक्टर ने कुछ चेकअप किए और दवाई लिख कर दे दी और बोला- अगर कल भी ऐसा ही होता है तो फिर और चेकअप के लिए लाना पड़ेगा।
क्योंकि डाक्टर को कुछ समझ में ही नहीं आया कि बीमारी क्या है। समझ में आता भी कैसे जब कोई बीमारी थी ही नहीं, शर्मा जी और संपत मुझे वापिस घर लेकर आ गए और रेणुका को बताया कि डाक्टर ने आज भर ध्यान रखने को बोला है, तो मुझे अकेला नहीं छोड़ सकते। रेणुका का घर छोटा था और मैं अकेली रहती थी तो मेरे घर में ज्यादा जगह थी।
मैंने कहा- अगर रेणुका को कोई ऐतराज ना हो तो आज शर्मा जी मेरे घर पर ही दूसरे कमरे में सो जाएँ।
रेणुका मान गई। शर्मा जी का दिल बल्लियों उछलने लगा। अब शर्मा जी मेरी चूत के नए शिकार थे। रेणुका और संपत अपने घर ले गए।
शर्मा जी ने मेन गेट बन्द किया और मुझे आँख मारते हुए लौड़ा सहलाने लगे और बोले- मैं भी अभी गुसलखाने से होकर आता हूँ।
वे जब तक गए तब तक मैंने अपनी अल्मारी से वोदका की बोतल निकाली और बोतल से ही एक लम्बा घूँट खींचा और फिर 555 सिगरेट की डिब्बी से एक सिगरेट निकाली और लाइटर से जला कर सोफे पर अपनी टाँगें पसार कर चूत को हवा खिलाने लगी।
आज मेरी चूत की रात रंगीन होने वाली थी। शर्मा जी गुसलखाने से बिल्कुल नंगधडंग अपना मस्त लौड़ा हिलाते हुए मेरे सामने पेश हुए। उन्होंने जब मुझे चूत पसारे सिगरेट पीते हुए देखा और सामने टेबल पर वोदका की भरी बोतल देखी तो किलकारी मार कर बोले- वाह जानेमन आज तो फुल मस्ती का इंतजाम है।
मैं उनका लौड़ा निहार रही थी- सुन बे बकलोल, ज्यादा चुदुर चुदुर मत कर, दारु पी ले सिगरेट पी ले पर मेरी चूत की सेवा में तूने कोई कसर छोड़ी तो मैं तेरी माँ चोद दूँगी…।”
मेरे इस बदले हुए स्वरूप को देखकर शर्मा जी की सिट्टी-पिट्टी गम हो गई। खैर फिर उनने खुद और मुझे वोदका पिलाई, सिगरेट फूँकी… और लग गए मेरी चूत चाटने में।
उस पूरी रात मैंने शर्मा जी के लण्ड का भुरता बना दिया और अब मेरे लिए वे एक अच्छे चोदू के रूप में मुझ मिल गए थे।
अभी के लिए फिलहाल इतना ही आप लोगों के इमेल प्राप्त होने के बाद मैं अपनी आगे की कथा लिखूँगी, तब तक के लिए नमस्कार।
thakuryash29@yahoo.com

दूध का घूँट

दूध का घूँट

प्रेषक : राजा गर्ग
मैं और प्रियंका लगभग रोज़ मिलते थे। मेरी सारी हसरतों को वो पूरा करने में माहिर थी, उसने अपने बेटे को मेरा स्टूडेंट बना दिया था। मैं रोज़ उसके घर जाता और उसके पति के जाने के बाद उस बेटे को होमवर्क दे कर दूसरे कमरे में जाता और उसे दीवार के सहारे लगा कर कभी उसके होंठ चूसता, कभी उसके मम्मे। उसके मम्मे मेरे दांतों के निशान से भरे पड़े थे। उसने अपने पति को बोल रखा था कि ये उसने खुद बनाए हैं। उसके होंठों को मैंने चूस-चूस कर सुजा दिया था। बड़ा स्वाद था साली के होंठों में, मज़ा देकर मेरा खड़ा कर देती थी।
मेरा जब भी मन करता मैं उसकी चूत का ढक्कन ज़रूर बजाता। कभी भी उसके कमरे में जाकर उसे बिस्तर पे लिटाया और उसकी साड़ी ऐसे ही उठा दी और बस शंटिंग मशीन चालू कर देता था। जब तक मन करता उसकी चूत मारता, जब मन भर जाता, तब चुम्मा चाटी चालू। बाहर उसका बेटा पढ़ता रहता, अन्दर उसकी माँ चुदती रहती। बड़ी नाइंसाफी होती उस बेचारे के साथ।
एक बार उसके पीरियड चल रहे थे, तो वो बोली- मेरी गांड ही मार लो बस !
उस दिन जितना वो तड़फी थी, वो उतना पहले कभी नहीं तड़फी थी। मैंने लंड उसकी गांड के छेद पे लगाया और सहलाने लगा। फिर मैंने हाथ धोने वाला साबुन हाथों में लिया और उसकी गांड के छेद पे और अपने लंड पर लगा लिया और लंड उसके छेद पे लगा कर एक ही बार में पूरा घुसा दिया, वो चीख पड़ी।
मैंने झट से अपने हाथ से उसका मुँह बंद किया तो कमीनी ने दांतों से मेरा काट खाया। मैंने फिर अपना लंड बाहर निकाला और उसकी गांड में फिर डाला और धीरे-धीरे उसकी गांड मारनी चालू कि वो दर्द से तिलमिला रही थी, मगर मुझे बड़ा मज़ा आ रहा था।
मैं उसकी तब तक मारता रहा, जब तक वो बदहवास नहीं हो गई। मैंने उसकी गांड मार कर उसे बिस्तर पर ही छोड़ दिया और अपने आप को धोने चला गया। जब तक मैं वापस आया, वो वैसे ही बदहवास सी बिस्तर पर पड़ी थी। उससे शायद उठा नहीं जा रहा था।
मैंने उसे उठाया और उसके कपड़े देकर कहा- ले अब पहन ले और जाकर अपने बेटे को देख.. क्या कर रहा है..!
जब भी हम कभी बाहर घूमने जाते तब मैं उसके हर अंग का स्वाद ढंग से चखता, फिर वो चाहे उसकी चूत हो या उसकी गांड, या उसकी बगलें हों या उसकी कमर, उसके हर अंग को मैंने ढंग से चाट चुका था।
कभी मेरा चाटने का मन नहीं होता तो घन्टों उससे अपना लंड चुसवाता रहता। उसे भी मज़ा आता था, वो मज़े ले-ले कर मेरा लंड चूसती रहती। एक बार तो मैंने मूवी हॉल में ही उससे अपना लंड चुसवाया था और उसकी टी-शर्ट उतार कर मजे से उसके मम्मे चूसे थे। उसके निप्पल बहुत बड़े-बड़े थे, तो उन्हें चूसने में मज़ा भी बड़ा आता था।
उस औरत के अन्दर बहुत आग थी। शायद उसका पति उसे वो सब नहीं दे पा रहा था, जिसके लिए उसने उससे शादी की थी। उसे शायद इसका ये ही मतलब मालूम था, बस, उसके मम्मों के दूध का स्वाद चखने की एक बड़ी तमन्ना बाक़ी रह गई थी।
यह तमन्ना भी उसने मेरी एक साल के आस-पास ही पूरी कर दी। उसके पति को एक और बच्चा चाहिए था, तो उसने ‘हाँ’ बोल दी।
मैंने कुछ टाइम के लिए उसके पास जाना छोड़ दिया मगर जब 14 महीने बाद मैं उसके पास गया, तब उसे माँ बने 5 महीने हो चुके थे। शरीर भी उसका पहले से भद्दा और फ़ैल गया था, मगर मुझे तो कुछ और ही काम था।
मैं उसके घर जब गया, तब उसका बेटा स्कूल में था और वो अपने दूसरे बच्चे के साथ कमरे में बैठी थी। मैं उसके साथ उसी के कमरे में गया और उसे वहीं पकड़ लिया।
वो बोली- यहाँ नहीं।
मैंने कहा- यहाँ कोई दिक्कत नहीं है, इसे क्या पता चलेगा।
और इतना कह कर, मैंने उसके मम्मे को कस के जकड़ लिया। वो मेरी उस जकड़ से छूट ही नहीं पाई। उसने ब्लाऊज पहन रखा था, जो मेरे हाथ में आ गया और चिर गया।
वो बोली- थोड़ा सा तो सब्र करो, अगर इतने में कोई आ गया, तो मैंने कपड़े कैसे पहनूंगी, नंगी थोड़ी ही जाऊँगी किसी के सामने।
मैंने उसे छोड़ दिया, वो दूसरे कमरे में गई और वहाँ जाकर अपने कपड़े उतारे और अपने लिए दूसरे कपड़े निकाले और फिर मुझे वहाँ बुला लिया। वो नंगी खड़ी थी।
मैं उसके पास गया और जैसे ही मैंने उसके मम्मे को जकड़ा तो उसमे भरा हुआ दूध छलक कर बाहर आ गया, जैसे किसी दूध की थैली में छेद हो गया हो। मैं मचल गया और उसके मम्मे दबाने लगा। उसमें से दूध बाहर आने लगा। जैसे कोई भैंस के थन दुहता है, वैसे मैं उसके थन दुह रहा था।
उनमें से लगातार दूध आ रहा था और मैं उसके मम्मे में से सारा दूध निकलने में लगा था। थोड़ी देर बाद जब उसके मुम्मे लाल होने लगे तो मैंने उसे दीवार के सहारे लगाया और उसके मम्मे को चूसने लगा। पहली बार जब मैंने उसके मम्मे को चूसा, मेरा मुँह उसके दूध से भर गया।
क्या मस्त एहसास था वो…!
मैं पूरी तरह मदहोश और बेकाबू हो चुका था, मैं प्रियंका के मुम्मे चूसे जा रहा और उनमें से निकलता हुआ दूध मेरे मुँह में जा रहा था।
फिर मैंने एक बार उसके दूध का घूँट भरा और उसके मुँह को खोला और उसमें डाल दिया। मैंने एक छोटा कप लिया और उसमें उसका दूध निकाला और फिर आराम से बैठ कर पिया।
मैं अपनी ठरक मिटा चुका था। मेरा काम पूरा हो चुका था मगर वो जाकर बिस्तर पर लेट गई और उसे लगा कि अब मैं उसकी लूँगा.. मगर मैं मूड में नहीं था। मैं कमरे के बाहर चला गया तो वो पीछे से आई और और मुझसे बोली- तुम्हारा काम तो हो गया, मगर मेरा क्या?
मैं बोला- जानू, आज बस इतना ही मूड था।
मगर वो बोली- आज मेरा मूड है, इतने दिन हो गए।
मगर मैंने कहा- आज नहीं, हाँ मगर किसी और दिन, तुम्हारी सारी हसरतें पूरी करूँगा, चिंता मत करो।
इतना कह कर मैं उसके घर से बाहर निकल गया। और वहाँ से चला गया मगर उसके पास जाने का फिर कभी मन नहीं हुआ।
प्रियंका की चुदाई की बड़ी याद आती है, उसका स्वार्थ चुदाई के लिए तो था, पर वो मुझे बहुत चाहती थी, जबकि मैं उसको सिर्फ अपने लौड़े के लिए एक आइटम समझता था।
मुझे आप अपने विचार यहाँ मेल करें।

शिप्रा की चुदास-2

शिप्रा की चुदास-2

प्रेषक : जय
मैं इन्हीं ख़यालों मैं डूबा था कि शिप्रा की आवाज़ आई, “अरे विक्की क्या सोच रहे हो…!”
मुझे झटका लगा, क्या बोलूँ, बोलूँ कि न बोलूँ ! तभी शिप्रा की आवाज़ दुबारा मेरे कानों में पड़ी, “विक्की तबीयत तो ठीक हैं…!”
मैंने कहा- तबीयत …! तबीयत को क्या हुआ ! ठीक तो है… बस कुछ सोच रहा था।
“क्या सोच रहे थे?” शिप्रा ने पूछा।
मैंने कहा- कुछ खास नहीं !
और उसके हाथों से बढ़ाया हुआ कॉफी का मॅग ले लिया और सिप लिया। वाकयी कॉफी बिल्कुल शिप्रा की ज़वानी जैसी कड़क बनी थी।
तो मैंने कहा- मुझे नहीं पता था कि तुम इतनी अच्छी कॉफी बना लेती हो।
वो मुस्कराई और कहा- हाँ..आआं.. कभी-कभी, वरना दीदी ही बनाती है।
अब हम लोग खामोश होकर कॉफी सिप कर रहे थे और मेरी नज़र शिप्रा के मम्मे की तरफ जा रही थी बार-बार लगातार। मैं कॉफी सिप करता जाता और उसके मम्मे देखता जाता। मुझे ये भी ख्याल नहीं रहा कि शिप्रा जिसके मम्मे मैं देख रहा हूँ, वो मेरे सामने बैठे ही कॉफी सिप कर रही है।
दोस्तों एक बात बताऊँ, हम लड़के चाहें जितनी होशियारी क्यों न करते हों, पर लड़कियों की नज़रों से नहीं बच सकते कि आप क्या सोच रहे हो? क्या देख रहे हो? वो लड़की जो बचपन से ये देखती आ रही हो कि लोगों की नज़र मेरी तरफ कम मेरे मम्मों की तरफ़ ज्यादा जाती है, तो वो क्या सोचती होगी…!
तभी उसने मुझे टोका, “जय…क्या देख रहे हो?”
इस सवाल ने मेरा पसीना निकाल दिया और मैं बिल्कुल हकला गया, मैंने कहा- कुछ.. कुछ… भी तो नहीं !
लेकिन शिप्रा आज कुछ और मूड में थी तो उसने कहा- नहीं कुछ देख रहे थे…!
उसके कहने के अंदाज़ ने मुझे और डरा दिया…।
उसने कहा- बोलो…क्या देख रहे थे…?
मैंने बड़ी हिम्मत करके उसके दोनों मम्मों की तरफ़ इशारा करते हुए कहा- वो..ओओओ… दोनों।
शिप्रा ने मेरी ऊँगलियों का इशारा समझते हुए भी कहा- मैं समझी नहीं मुँह से बोलो, क्या देख रहे थे…?
अब मुझे ये नहीं समझ मैं आया कि मैं क्या बोलूँ, मैंने कहा- सीना….देख रहा था।
शिप्रा ने कहा- सीना ! क्यों…सीने में क्या है…?
अब मैं चुप ! क्या बोलूँ !
उसने फिर कहा- अरे ! बोलते क्यों नहीं हो…!
तो मैंने कहा- तुम्हारी चूचियों को…!!
जिस प्रकार डरते हुए उसको मैंने ये वर्ड बोला …वो ज़ोर से हँस दी…और कहा- अरेएए यार … तो डर क्यों रहे हो? कौन आज पहली बार तुम इन्हें देख रहे हो या कौन से पहले तुम हो जो इसे देख रहे हो ! देखने वाली चीज़ है सब देखते हैं…! तो तुम देख रहे हो तो क्या अपराध कर रहे हो…!
जब शिप्रा ने ये वर्ड्स बोले, तब मेरी जान में जान आई और मैं मुस्कराए बगैर नहीं रहा सका…और अपनी झेंप मिटाने लगा।
उसी वक्त शिप्रा सामने वाले सोफे से उठकर मेरे बगल में सटकर बैठ गई और मेरे हाथों से कॉफी का मॅग ले कर टेबल पर रख दिया और मेरी आखों की तरफ देखने लगी…और कहा- अब देखो… जो देखना है…!
मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ ! तभी उसने अपने होंठों को मेरे होंठों पर रख दिए और कहा- शायद अब तुमको देखने में आसानी होगी।
और ज़ोर से मेरे होंठों को चूसने लगी। थोड़ी देर में मैं गरमा गया और मेरे हाथ उसकी चूचियों को दबाने लगे और अब मैं भी उसके होंठों को चूस रहा था। ये मेरी लाइफ का सबसे बड़ा और हॉट दिन था। आज से पहले मैंने कभी ऐसा महसूस नहीं किया था। धीरे-धीरे हम दोनों की साँसें गरम हो रही थीं और मेरे हाथों का दबाव उसकी चूचियों पर बढ़ता ही जा रहा था और वो ज़ोर-ज़ोर से साँसें ले रही थी।
तभी वो मेरे बगल से उठ कर मेरे ऊपर दोनों घुटनों को मोड़ कर अपने हिप्स को मेरे ऊपर रख कर मेरी तरफ अपना सीना दिखाते हुए बैठ गई। मेरे ऊपर चढ़ कर मेरे होंठों को बदस्तूर दबाए जा रही थी। मैंने भी उसे अपनी बाहों में कस कर भर लिया और उसेके रसीलें होंठों को चूसने लगा।
जिस अंदाज़ से वो मेरे ऊपर बैठी थी, उससे उसके चूतड़ों का भार मेरे लंड पर पड़ रहा था, जिसकी वजह से मेरा लंड टाइट होने लगा और उसके चूतड़ों के बीच की दरार को छूने लगा।
शिप्रा ने मादक आवाज में पूछा- जय ये मेरे नीचे कड़ा-कड़ा क्या लग रहा है?
मैंने भी उसी मदहोशी के आलम में कहा- शिप्रा ये मेरा लंड है।
“क्या मैं इसे देख सकती हूँ?”
मैंने कहा- डार्लिंग ये सिर्फ़ तुम्हारे लिए ही है।
और वो सोफे से उतर कर नीचे ज़मीन पर घुटने के बल बैठ गई और अपने हाथों से मेरी पैंट के ऊपर से ही लंड पकड़ लिया और वो मेरी तरफ़ देखते हुए मेरा लंड मसलने लगी।
मैंने बढ़कर उसके होंठों को चूम लिया और हाथों से मैं अब उसकी टी-शर्ट उतारने लगा, तो उसने अपने दोनों हाथों को ऊपर कर दिया और मैंने उसकी टी-शर्ट उतार दी। वो अंदर ब्रा में अपने मिनी फ़ुटबाल जितनी चूचियों को दबाए हुए थी। वो बिना परवाह किए मेरे लंड को पैंट के ऊपर से मल रही थी। मैंने ब्रा के ऊपर से उन हिमालय जितनी विशाल चोटियाँ देख कर दंग हो गया।
जो कल तक मेरे सपना था, आज हक़ीक़त बनकर मेरे सामने खड़ा था। जिन्हें दबाने की मैं कल्पना किया करता था, आज मैं उन्हें रियल में दबा रहा हूँ। मैंने उन्हें खूब जमकर दबाया, उसके बाद उसकी ब्रा खोल दी। दो उछलती हुई गेंदें बाहर आ गईं। उन चूचियों को मैंने क़ैद से आज़ाद कर दिया और वो अब मेरे सामने सीना ताने खड़ी थी।
मैंने शिप्रा को अपनी गोद में बैठा लिया और उसकी एक चूची को अपने मुँह में भर लिया और दूसरी को अपने हाथों से दबाने लगा।
अब शिप्रा के मुँह से सिसकारियाँ निकलने लगीं, “आआआआआआ ईईईईईईई…।”
उसका बदन अंगारों की तरह तप रहा था। मेरा लंड पैंट से निकलने के लिए बेताब हो रहा था।
मैंने शिप्रा से कहा- जानू अब मेरा हथियार अपने होंठों से चूसो !
उसने तुरंत मेरी पैंट की ज़िप खोल कर लंड बाहर निकाल लिया और उसे देख कर मेरी तरफ़ मुस्कराई और उसे चूसने लगी। मैं सोफे पर से उतर गया और पैंट पूरी उतार दी। अब मेरा पूरा लंड शिप्रा के सामने था और वो मज़े से चूस रही थी। अब मैंने अपने बचे कपड़े भी उतार दिए और शिप्रा मेरा लंड चूसने में मस्त थी।
अब मैंने उसको खड़ा करके उसे अपनी बांहों में भर लिया और उसकी जींस उतार दी। वो बिल्कुल नंगी मेरे सामने खड़ी थी और मैं उस नंगे बदन को निहार रहा था।
उसकी चूत की घाटी पे उगे छोटे-छोटे बाल मुझे बिल्कुल फूलों जैसा अहसास दे रहे थे। मैंने तभी एक हाथ से उसकी चूची पकड़ी और दूसरे हाथ की ऊँगली उसकी चूत में डाल दी। उसकी चूत बिल्कुल गीली हो चुकी थी। उसने लिसलिसा पानी छोड़ दिया था। मैंने अच्छी तरीके से अपनी ऊँगली को उसकी चूत में डाल दी। धीरे से मैंने दो ऊँगली उसकी चूत में डालीं, तो वो सिहर उठी।
जब मेरी दोनों उँगलियाँ चूत के पानी से गीली हो गईं, तो मैंने उन दोनों ऊँगलियों को अपने मुँह में डाल लीं। फर्स्ट टाइम मुझे जन्नत के स्वाद का अहसास हुआ। अब मैंने उसे सोफे पर लिटा दिया। हम दोनों पूरी तरह से नंगे हो चुके थे। जल्दी कोई थी नहीं क्योंकि अभी तो दोपहर थी और सबको आना था रात में। मैंने उसके पूरे बदन को अपनी जीभ से चाटने लगा और चूचियों को लगातार दबा रहा था। उसका बदन पूरे तरीके से भभक रहा था… वो बुरी तरीके से गरम हो चुकी थी।
मैंने अपनी उँगलियों से उसकी चूत को चोद रहा था। उसके मुँह से सिसकारियाँ निकल रही थीं, “ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्छ ईईईईईईईईए जय अब मुझे चोद दो मैं बर्दास्त नहीं कर पा रही हूँ।”
अब मैंने उसे अपने बदन के ऊपर लेता हुआ सोफे पर लेट गया और 69 की पोजीशन बना ली। मैंने बहुत सी ब्लू फिल्म्स में ऐक्टर और ऐक्ट्रेस को इस तरीके से मज़ा लेते देखा था, इसलिए मैंने शिप्रा को बताया उसे क्या करना है?
वो मेरा लण्ड लेकर उसे चूसने लगी और मैं उसकी चूत को चाटने लगा। मैं उसकी चूत को कभी ऊँगलियों से, तो कभी जीभ से चोद रहा था। उससे रहा नहीं गया वो मेरे लंड को खा जाने वाली स्टायल से चूस रही थी और मैं उसकी चूत को बड़े प्यार से जीभ से चोद रहा था।
वो मेरा लंड चूसना छोड़ कर मादकता से भरी कराह निकालने लगी और मेरी तरफ़ याचना की नज़र से देखने लगी, जैसे कह रही हो, बस करो जय खेलना ! जो बाँध टूटने वाला है ! अब मुझसे नहीं रुक रहा है…..!
तो मैंने उसे अब सोफे पर लिटा दिया और अपने लंड का सुपाड़ा उसकी चूत के मुँह पर रख दिया और बाहर से ही उसके ऊपर लंड का लाल वाला हिस्सा जिसे सुपाड़ा कहते है रगड़ने लगा। हम दोनों को एक जलन सा अहसास होने लगा, जो कभी तो ठंडा लगता और कभी भट्टी की तरह गरम।
जब मुझसे भी रहा नहीं गया, तब मैंने अपना लंड पकड़ के उसकी चूत के अन्दर डाला। लेकिन चूत बहुत टाईट थी। मैंने थोड़ा जोर लगाया तो शिप्रा चिल्ला उठी। मैंने उसके होंठों पर अपने होंठों को रख दिया और चूसने लगा। कुछ सेकेंड बाद मैंने एक जोर का धक्का दिया तो मेरा आधा लंड चूत में चला गया।
उसने चीखना चाहा, पर मेरे होंठों ने उसकी चीख रोक दी। मैंने उसके होंठों चूसना बदस्तूर जारी रखा। जब उसे थोड़ा आराम मिला, तो फिर एक जोर का धक्का और लगाया उसकी चीख के साथ ही खून की एक धार भी निकल पड़ी चूत से, पर मैंने परवाह नहीं की क्योंकि ये तो होता ही जब नई चूत फटती है।
मैंने धीरे-धीरे अपने लंड को अन्दर-बाहर करना शुरु किया। पहले तो उसके मुँह से “ऊँ…ऊँ” की आवाजें आती रहीं, फिर कुछ देर बाद वो भी अपनी कमर उठा-उठा कर मेरा साथ देने लगी। अब हम दोनों हवा में उड़ रहे थे। कमर एक ताल में चल रही थी।
जब मैंने देखा शिप्रा को अब कोई दर्द नहीं है, तो हमने अपनी स्टायल को बदल लिया और डॉगी-स्टायल में आ गए। मैं उसे पीछे से खड़ा करके चोद रहा था और एक हाथ से उसके बाल पकड़े हुए था और दूसरे हाथ से उसकी ‘बमपिलाट चूचा’ दबा रहा था। अपने लंड से शिप्रा की चूत चोद रहा था और शिप्रा के मुँह से आवाजें आ रही थीं।
वो लंड पहली बार खा रही थी, इसलिए शोर ज्यादा मचा रही थी, पर मैं परवाह किए बगैर उसे हचक कर चोद रहा था। तभी शिप्रा का बदन अकड़ने लगा और वो एकदम से ढीली हो गई। मैंने दुबारा उसे जल्दी से तैयार किया और अबकी बार उसे अपनी गोद में लेकर चोदा।
उस दिन हमने एक-दूसरे को 3 बार चोदा। वो दिन मेरी लाइफ का सबसे हसीन दिन था। मुझे मेरी जवानी का अहसास शिप्रा ने ही कराया था। हम दोनों ने फर्स्ट टाइम जन्नत की सैर की। उसके बाद हम दोनों ने एक साथ बाथरूम में शावर लिया और काफ़ी पीने बैठ गए।
मैंने शिप्रा को आज के लिए ‘थैंक्स’ कहा तो शिप्रा ने मुस्कराया और कहा- नहीं जय, तुम नहीं जानते, आज मैंने तुमसे क्या पाया, इसका अगर तुम्हें अहसास होता, तो तुम मुझे ‘थैंक्स’ न कहते बल्कि मुझे तुम्हें ‘थैंक्स’ कहना चाहिए।
फिर थोडी देर हम लोगों ने नॉर्मल होने के लिए कुछ इधर-उधर की बातें की और दुबारा इसी तरीके से मौका मिलने पर एक-दूसरे को चोदने का वादा किया !
आपको मेरी ये कहानी कैसी लगी। मुझे ज़रूर मेल करके बताएं।

यौन-संसर्ग का सीधा प्रसारण

यौन-संसर्ग का सीधा प्रसारण

टी पी एल
प्रिय कामवासना के पाठको, मेरा आप सबको सादर प्रणाम !
मैं पिछले तीन वर्षों से कामवासना की पाठिका हूँ और इन तीन वर्षों में मैंने इसमें प्रकाशित काफी कहानियाँ पढ़ी हैं !
मुझे कुछ रचनाएँ तो बहुत ही पसंद आई क्योंकि वे बहुत ही उच्चतम शैली में लिखी गई थी ! उन रचनाओं में कहानी का विवरण इतना रोचक था कि मैं कई बार उनको पढ़ते पढ़ते उन्ही में खो जाती थी और ऐसा महसूस करती थी कि मैं भी उसी रचना का एक अंग ही हूँ ! ऐसी रचनाओं के लेखक एवं लेखिकाओं को मैं बाधाई देती हूँ और उनसे आग्रह करती हूँ कि आगे भी आने वाली रचनाओं का सृजन वे केवल अपनी ही शैली में करें !
कामवासना के अपार रचना भण्डार में से जो भी रचनाएँ मैंने पढ़ी है उन सभी में से मेरे आंकलन के अनुसार कुछ ही रचनाएँ ऐसी थी जिन्होंने मुझे बहुत प्रभावित किया ! उन कुछ में से तीन रचनाएं ‘दीप के स्वप्नदोष का उपचार’, ‘कीकर और नागफणी’ और ‘तृष्णा की तृष्णा पूर्ति’ है जिन्होंने मुझे भी अपनी जीवन में घटित एक घटना पर आधारित यह रचना लिखने के लिए प्रेरित किया !
कामवासना पर पढ़ी बाकी रचनायें कुछ अच्छी और कुछ सामान्य थी लेकिन अधिकतर रचनाएँ ऐसी थी जिनमें रचना को रोचक बनाने में कम और सिर्फ वासना की ओर अधिक ध्यान दिया गया था।
मेरे साथ मेरे जीवन की घटित यह पहली घटना लगभग आठ वर्ष पहले की है जब मैंने दिल्ली से जुड़े राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के एक छोटे से शहर में एक प्रसिद्ध इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ने के लिए प्रवेश लिया था। छात्रावास में उपयुक्त स्थान न होने के कारण मेरे लिए उसमे प्रवेश की व्यवस्था नहीं हो सकी इसलिए मैंने कॉलेज के सामने की कॉलोनी में ही अपनी एक कक्षा सखी मोनिका के साथ मिल कर एक शयनकक्ष वाला फ्लैट किराये पर ले लिया और उसमें रहने लगी थी। उस फ्लैट में दो कमरे थे, हमने आगे वाले बड़े कमरे को बैठक बना दिया था और दूसरे कमरे को हम दोनों सखियों ने अपना शयनकक्ष बना लिया था।
पहले माह के शुरू में तो हम दोनों को वहाँ के माहौल में समायोजित होने में काफी असुविधाओं का सामना करना पड़ा, लेकिन माह के अंत होते होते हमने सभी कठिनाइयों का समाधान ढूंढ कर और उन सब पर विजय भी पा ली ! इसके बाद अगले दो माह में पढ़ाई का बहुत ही जोर रहा तथा हम दोनों अधिकतर उसी में उलझी रहती थी !
प्रवेश के बाद के पहले तीन माह की पढ़ाई समाप्त होते ही बीस दिन तक परीक्षाओं होती रही और उसके बाद ही जब हमें दस दिन की दशहरा की छुट्टियाँ हुई तभी हम अपने अपने घर जा सकी।
मैं तो छुट्टियों समाप्त होने से एक दिन पहले ही दोपहर के समय अपने फ्लैट में पहुँच गई थी और मोनिका के आने की प्रतीक्षा करने लगी, लेकिन मोनिका उस दिन रात्रि को लगभग नौ बजे पहुँची। मैं तो अपने घर से अकेले ही आई थी लेकिन मोनिका को घर से चलने में देर हो गई थी इसलिए उससे एक वर्ष छोटा उसका भाई रोहित उसे शहर छोड़ने के लिए उसके साथ ही आया था।
क्योंकि रात बहुत देर हो गई थी और रोहित को घर वापिस जाने के लिए कोई भी साधन नहीं था इसलिए वह रात के लिए बाहर बैठक में रखे तख्त पर बिस्तर लगा कर उसी पर सोने चला गया।
रात के दो बजे जब मेरी नींद खुली और मैं लघुशंका के लिए उठी तो मोनिका को अपने साथ वाले बिस्तर पर सोये हुए नहीं पाया तब मुझे कुछ अचम्भा हुआ लेकिन यह सोच कर कि शायद वह भी लघुशंका के लिए गई होगी इसलिए मैं अपने बिस्तर पर ही बैठी उसके गुसलखाने से बाहर आने की प्रतीक्षा करती रही। पाँच मिनट तक बैठे रहने के बाद भी जब मुझे गुसलखाने से कोई आहट नहीं आई तब मैंने उठ कर गुसलखाने के दरवाज़े को खटखटाने के लिए हाथ लगाया ही था कि दरवाज़ा खुल गया। गुसलखाने के अन्दर मोनिका को नहीं पाकर मुझे कुछ विस्मय तो हुआ लेकिन लघुशंका के दबाव के कारण मैं पहले उससे निपटने के लिए फ्लश पॉट पर बैठ गई और अपने मूत्राशय को खाली कर दिया।
लघुशंका के दबाव से राहत पाकर जब मैं गुसलखाने से बाहर आई तो मुझे मोनिका की याद आई और मैं उसे ढूँढने के लिए बैठक की ओर गई। जैसे ही मैं दरवाज़े तक पहुँच कर बैठक के अन्दर झाँका तो वहाँ का दृश्य देख कर अवाक रह गई।
मैंने देखा कि मोनिका और रोहित दोनों निर्वस्त्र लेटे हुए थे और रोहित का सिर मोनिका की दोनों जाँघों के बीच में था और वह अपने मुँह से मोनिका की योनि को चाट रहा था, उधर मोनिका का सिर भी रोहित की टांगों की ओर था और वह रोहित के लिंग को अपने मुँह ले कर चूस रही थी तथा अपना सिर हिला कर उसके साथ मुखमैथुन कर रही थी।
मैंने अपने आगे बढ़ते कदम वहीं दरवाज़े पर रोक दिए और वापिस अपने बिस्तर की ओर जाने के लिए मुड़ी ही थी कि मुझे मोनिका के बोलने की आवाज़ सुनाई दी। मैं तुरंत पलट कर वापिस दरवाज़े की ओट में खड़ी होकर बैठक में झाँका और उनकी बातें सुनने लगी। मोनिका रोहित से कर रही थी कि उसका तो दो बार पानी निकल चुका था और वह अब पुनः यौन संसर्ग के लिए बिल्कुल तैयार थी। तब मैंने देखा कि रोहित उठ कर सीधा होकर मोनिका के ऊपर झुक गया और मोनिका ने उसके लिंग को पकड़ कर अपनी योनि के छिद्र पर लगा कर रोहित को अपने लिंग को उसके अन्दर डालने के लिए कहा।
मोनिका के मुख से यह निर्देश सुनते ही रोहित ने एक धक्का लगा दिया जिससे उसका आधा लिंग मोनिका की योनि के अन्दर चला गया। रोहित के लिंग के मोनिका की योनि में झटके से प्रवेश होते ही मोनिका की एक हल्की सी चीत्कार सुनाई दी और मैंने मोनिका को गुस्से से भरी आवाज़ में रोहित को डांटते हुए सुना- रोहित, मैंने तुझे कई बार समझाया है कि आराम से डाला कर ! तुझे जल्दी किस बात की होती है जो इतनी जोर से अन्दर धकेल देता है, अपनी टोंटी को? मैं कहीं भाग कर तो जा नहीं रही हूँ और यहाँ तो मम्मी और पापा भी नहीं है जिनका तुझे डर लग रहा हो !
मोनिका की बात सुन कर रोहित ने कहा- मोनी, तेरी सखी तो यहाँ है, अगर वह जाग गई और हमें इस हालत में देख लिया तो हमारा सारा भेद खुल जाएगा और मम्मी पापा को भी पता चल जाएगा !
तब मोनिका बोली- रोहित, मैंने तुम्हें कई बार बताया है कि जोर से करने और जल्दी जल्दी करने से मुझे आनन्द नहीं मिलता, इसलिए अगर आराम से कर सकता है तो कर नहीं तो अपना बाहर निकाल ले मैं उंगली कर के संतुष्टि पा लूंगी ! हाँ, अगर मेरी सखी ने हमें इस हालात में देख लिया तो मैं उसे भी तेरे साथ यह सब करने के लिए तैयार करा दूंगी !
तब रोहित ने मोनिका के होंटों पर अपने होंट रख कर उसका प्यार भरा चुम्बन लेने लगा और शरीर के नीचे के भाग में दबाव बढ़ा कर अपने लिंग को मोनिका की योनि के अन्दर धीरे धीरे धकेलने लगा ! देखते ही देखते रोहित का वह खंज़र मोनिका की योनि के रास्ते उसके जिस्म में गायब हो गया।
चूंकि मैं ऐसा दृश्य पहली बार देख रही थी इसलिए अचंभित सी आँखें फाड़ कर उस क्रीड़ा को देखने में मग्न हो कर सोच रही थी कि क्या लड़की के जिस्म में किसी लड़के का सात इंच लम्बा लिंग समा सकता है?
मेरी इस विचारधारा में अवरोध तब आया जब मैंने रोहित को मोनिका के होंटों से अपने होंट चिपका कर और नीचे से कुछ ऊँचा होकर अपने लिंग को मोनिका की योनि से थोड़ा बाहर निकाल कर फिर से अन्दर धकेल दिया !
इसके बाद रोहित यही क्रिया बार बार दोहराने लगा, पहले धीमी गति से और फिर मध्यम गति से! जब भी रोहित अपने लिंग को अन्दर की ओर धकेलता तभी मोनिका रोहित के लिंग का स्वागत करने के लिए अपने कूल्हे ऊपर को उठाती और उसे अपने में लुप्त कर लेती।
लगभग दस मिनट तक रोहित अपने लिंग को मोनिका की योनि के अन्दर बाहर करता रहा, कभी मध्यम गति से तथा कभी तीव्र गति से ! उन दस मिनट में मोनिका ने दो बार अपनी टाँगें भींची थी और उसका पूरा बदन भी अकड़ गया था !
उस समय मोनिका ने अह्ह… अह्ह्ह… उन्ह्ह्ह… उन्ह्ह्ह… की सिसकारियाँ भी निकाली थी और रोहित को गति तीव्र करने का आग्रह भी किया।
रोहित ने मोनिका के आग्रह को स्वीकार करते हुए अपने लिंग को मोनिका की योनि के अन्दर बाहर करने की गति को अत्यंत तीव्र कर दिया। फिर क्या था पूरे कमरे में मोनिका की सिसकारियों के साथ साथ उसकी योनि से निकल रही फच्च… फच्च… की आवाज़ का मधुर संगीत गूंजने लगा !
अब तो मोहित भी उस संगीत में अपनी हुंह… हुंहह… हुंहह… की सिसकारियों से जुगलबंदी करने लगा।कमरे का वातावरण बहुत ही संगीतमयी हो गया था और मैं भी उन मधुर क्षणों का आनन्द उठा रही थी जब मुझे अपने जीवन का एक सत्य पहली बार कुछ महसूस हुआ।
वह सत्य मेरी योनि में से निकल कर मेरी जाँघों को गीला करने लगा था, मैंने जब अपना हाथ अपनी जाँघों और योनि पर लगाया तो वहाँ के गीलेपन ने मुझे मेरी उत्तेजना का बोध कराया !
मैं मन ही मन अपने आप को मोनिका के स्थान पर देखना चाहती थी और मेरे वहाँ न होने के कारण मुझे मोनिका के सौभाग्य पर जलन की अनुभूति भी होने लगी थी !
तभी मोनिका और रोहित की आह्ह… आह्ह्ह… आह्ह्ह… आह्ह्हह… आह्ह्हह्… की सिस्कार ने मेरी तन्द्रा को तोड़ दिया, मैंने उन दोनों की ओर देखा तो पाया कि उन दोनों के बदन अकड़े हुए थे और वे दोनों पसीने में लथपथ हांफ रहे थे।
कुछ ही क्षणों में मैंने देखा की रोहित का सारा बदन ढीला पड़ गया और वह निढाल हो कर मोनिका के ऊपर लेट गया था ! मोनिका भी उस समय शांत लेटी हुई थी और शायद उस असीम संतुष्टि का पूर्ण आनन्द उठा रही थी !
तब मुझे एहसास होने लगा कि मुझे वहाँ से चली जाना चाहिए इसलिए मैं तुरंत मुड़ कर अपने बिस्तर पर जा कर लेट गई !
अपनी उत्तेजित वासना की तृप्ति को शांत करने के लिए आँखें बंद कर अपने पर नियंत्रण किया और निंद्रा के आगोश में खो गई !
जब बाहर के दरवाज़े की घंटी बजी तब मेरी निद्रा टूटी और मैंने घड़ी की ओर देखा तो छह बज चुके थे, मैंने उठ कर इधर उधर देखा लेकिन मुझे मोनिका कहीं दिखाई नहीं दी तो मैंने जा कर बाहर का दरवाज़ा खोला! बाहर मध्यम रोशनी में मोनिका को अपना सामान लिए खड़े पाया और वह मुझे देखते ही झल्ला कर बोली- दस मिनट से घंटी बजा रही हूँ क्या कर रही थी?
मैंने उत्तर में उसे कह दिया- मैं सो रही थी और तुम इतनी सुबह कहाँ गई थी?
मोनिका घर के अन्दर आती हुई बोली- पगली अभी सुबह कहाँ से हो गई? अभी तो रात होने वाली है और मैं तो अभी घर से आ रही हूँ ! कल से कॉलेज की कक्षा जो शुरू होने वाली हैं !
मोनिका की बात सुन कर मुझे बोध हुआ कि मैं दोपहर को अपने फ्लैट में पहुँच कर यात्रा की थकावट के कारण सो गई थी और मैंने जो भी देखा या एहसास किया था वह मेरी कल्पना का एक सुन्दर एवं मीठा सपना था !